जीवन यात्रा का टिकेट


आज मेरी प्रसनता का कोई सनी नहीं,
आखिर पा ही तो लिया है मैंने टिकेट यात्रा का
इस पड़ाव से उस पड़ाव तक |

ये भी तय है की मेरी जगह पक्की है यहाँ,
तब तक जब तक सफ़र अच्छा होगा,
या फिर कोई दुर्घटना न घटित हो यात्रा में |

आखिर टिकेट अपने से नहीं मिला, खरीदा है मैंने कुछ ऊँचे बोल लगाकर |

ये टिकेट मेरा न था , था किसी अबोध लड़की का,
लेकिन कर लाख जतन, लाइन में उसको धक्का मार गिरा, पंक्ति से बाहर कर ही दिया मैंने उसको 

अब ये यात्रा मैं करूँगा, मैं बढूँगा अलग अलग पडावो पर सुंदर स्टेशनों को निहारते,
आखिर पा ही तो लिया है मैंने टिकेट यात्रा का
इस पड़ाव से उस पड़ाव तक |

                                                                                               दिनेश आर्य "दीनू"

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