कहाँ जायें, कैसे खाएं ?

कहाँ जायें, कैसे खाएं ?
नहीं सूझता कोई उपाय,
"हाथ" का चांटा इदर भी है |
"फूल" का काँटा उधर भी |
कहता है कोई मुझे बदलो !
या फिर बदलो अपना मन !
कटने को "हसिया" इधर भी है |
दबने को "हाथी" उधर भी |
रूप बदलो, कर्म बदलो !
आ रही है ये पुकार |
जलने को "लालटेन" इधर भी है |
मरने को "कुर्सी" उधर भी |

                                          दिनेश आर्य "दिनू"



वर्तमान राजनीतिक परिस्तिथियों से  उपजा एक अंतर्द्वंद और उसका जवाब , जब सब हमें लुटने पर अमादा हैं तो किसको हम अपना समझें ?

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