क्या में काबिल प्रेम नहीं ?


देखता हूँ जीवन अपना, 
तो पाता हूँ
तनहा और अकेला दिल
एक दूर कहीं |
खोजता हूँ तो में पाता,
प्रेम नहीं पर प्रेमान्तक
की राह वहीँ | 
मन में मेरे,
करुणा भी है, भाव भी है,
और प्रेम भी है | 

बस इतना तू मुझे बता दे-

मैं भी तेरा ही बन्दा हूँ , तो फिर
क्या में काबिल प्रेम नहीं ?
                       
                                     दिनेश आर्य "दिनू"

समाज के उस व्यथित हिस्से की तड़प , जो समाज में होते हुए भी अपने को तनहा और वीरान पता है और परमात्मा से सवाल करता है की  क्या मैं प्रेम के काबिल नहीं हूँ ?

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