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चेहरे पे गुलाब

तुने चेहरे पे जो, गुलाब सज़ा रखा है वो मुझे मेरी जां, मदहोश किये जाता है | ना फेर हाथ, बार बार लटों पर ऐसे मेरा तो रोम रोम इनमे उलझ जाता है | तेरी इस चाल के, मैं अब कहूँ क्या अफसाने ? की सरे राह, मेरा मन ही भटक जाता है | हंसी तेरी है, ये मखमल ! या है कोई जादू ? मेरा वजूद मुझ में खुद ही बिखर जाता है | रहम ! न देख मुझे, उन नज़र झरोखों से के तेरा क्या, मेरा तो क़त्ल हुआ जाता है | दिनेश आर्य "दीनू"