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Showing posts from 2011

जीवन यात्रा का टिकेट

आज मेरी प्रसनता का कोई सनी नहीं, आखिर पा ही तो लिया है मैंने टिकेट यात्रा का इस पड़ाव से उस पड़ाव तक | ये भी तय है की मेरी जगह पक्की है यहाँ, तब तक जब तक सफ़र अच्छा होगा, या फिर कोई दुर्घटना न घटित हो यात्रा में | आखिर टिकेट अपने से नहीं मिला, खरीदा है मैंने कुछ ऊँचे बोल लगाकर | ये टिकेट मेरा न था , था किसी अबोध लड़की का, लेकिन कर लाख जतन, लाइन में उसको धक्का मार गिरा, पंक्ति से बाहर कर ही दिया मैंने उसको  अब ये यात्रा मैं करूँगा, मैं बढूँगा अलग अलग पडावो पर सुंदर स्टेशनों को निहारते, आखिर पा ही तो लिया है मैंने टिकेट यात्रा का इस पड़ाव से उस पड़ाव तक |                                                                                                दिनेश आर्य "दीनू"

ये कैसा अर्थज्ञान है ?

ये कैसा अर्थज्ञान है  ? करोड़ को करोड़ है ,रोड वाला रोड है  अमीर बन रहा अमीर, जल रहे है द्वार दीप  और रोज फूँक रहे है, शव ! दरिद्र द्वार पर | ये कैसा अर्थज्ञान है  ? जितने  दन्त हैं दरिद्र, उतना उसको दान मान और बाकियों का पुण्य , गज उदर सामान है | ये कैसा अर्थज्ञान है  ? रो रही है सभ्यता , खो रही वो मान है  कोष अपना कर अपार, हंस रहा विधान है | ये कैसा अर्थज्ञान है  ? हो रही धरा वीरान, ले रही है दास प्राण  कर लगा के देखता वो ईश सब ,महान है | ये कैसा अर्थज्ञान है  ?                                                      दिनेश आर्य "दिनू" समाज में हो रही उथल पुथल और आर्थिक हालातों का चित्रण और द्वन्द है "ये कैसा अर्थज्ञान है  ?"  

सुधार हो समाज मैं , प्रयत्न हो, विकास का !

सुधार हो समाज मैं , प्रयत्न हो,  विकास का ! देश, कट मरे भले , सद्भाव हो उपवास का | सुधार हो समाज में, प्रयत्न हो,  विकास का | दरिद्रता, ना हो, या हो, विनाश हो दरिद्र का | सुधार हो समाज में, प्रयत्न हो,  विकास का | की हार जाये सब भले, तू अश्वमेध रथ चला |                             दिनेश आर्य "दीनू" समाज में सुधार की बहुत आवश्यकता  है और हमारे प्रतिनिधि इस दिशा में काम भी कर रहे है आओ उनका होसला बढाएं |

प्रेमशूल का घाव |

बहुत दिनों के बाद आज, जब नींद टूटी, जागा में एक तीव्र वेदना,  और दर्द के साथ  जख्जोर स्वयं को देखा, अन्दर , पाया मन में घाव अश्रु बह गए, संग रोया मन,  सुनकर के वह आह: || ईश्वर से  फिर  कारण पूछा ? आया एक उद्घोष ! ये तू है ! तेरा ही तो है, प्रेमशूल का घाव |                                                     दिनेश आर्य "दिनू"  एक प्रेमी जो  अभी अभी  अपनी प्रेमिका से अलग हुआ है , और अपनी खुशियों को बनावटी और छद्म माध्यमों से प्राप्त करना चाहता है अचानक एक सुबह अपने हसीं सपनो को तोड़ता उठ बैठता है और उस दर्द को महसूस करता है , जिसको वो भूलने का स्वांग कर रहा है | इसी अंतर्द्वंद के बीच ईश्वर या यूँ कहें अपने आप से हुआ संवाद है.    "प्रेमशूल का घाव "

अप्रितम शुभ्र कुसुम सी लाली, अम्बर पर

अप्रितम शुभ्र कुसुम सी लाली, अम्बर पर | हवन की वेदी सी पावन, निश्चल, सुंदर || है अग्नि सी तेज़ विराट, अभ्यंकर भी वो | है नदी सी बहती निश्चल, निर्झर, चंचल जल || उषा की पहली किरण सी है वो चमकीली | भोर की खिली, कलि सी वो नाजुक, कोमल || माध्य पहर सी जीवट और कठोर भी वो | सांझ की मधुर हवा , बहती मन में कल कल ||                                                                                         दिनेश आर्य "दिनू"

कौन बचाए दिल्ली |

कहीं धुप्प अँधेरे में दिखती, रोशनी की उम्मीद सी दिल्ली | खामोश सन्नाटे को चीरती, अबोध बाल किलकार की फरियाद सी दिल्ली | आज खामोश है,  किसी चिर मूर्छा में लक्ष्मण की नींद सी  | आये कोई , हनुमान संजीवन संग और दे प्राण ,  बचाए दिल्ली |                                                                                    दिनेश आर्य "दिनू"

कहाँ जायें, कैसे खाएं ?

कहाँ जायें, कैसे खाएं ? नहीं सूझता कोई उपाय, "हाथ" का चांटा इदर भी है | "फूल" का काँटा उधर भी | कहता है कोई मुझे बदलो ! या फिर बदलो अपना मन ! कटने को "हसिया" इधर भी है | दबने को "हाथी" उधर भी | रूप बदलो, कर्म बदलो ! आ रही है ये पुकार | जलने को "लालटेन" इधर भी है | मरने को "कुर्सी" उधर भी |                                           दिनेश आर्य "दिनू" वर्तमान राजनीतिक परिस्तिथियों से  उपजा एक अंतर्द्वंद और उसका जवाब , जब सब हमें लुटने पर अमादा हैं तो किसको हम अपना समझें ?

क्या में काबिल प्रेम नहीं ?

देखता हूँ जीवन अपना,  तो पाता हूँ तनहा और अकेला दिल एक दूर कहीं | खोजता हूँ तो में पाता, प्रेम नहीं पर प्रेमान्तक की राह वहीँ |  मन में मेरे, करुणा भी है, भाव भी है, और प्रेम भी है |  बस इतना तू मुझे बता दे- मैं भी तेरा ही बन्दा हूँ ,  तो फिर क्या में काबिल प्रेम नहीं ?                                                               दिनेश आर्य "दिनू" समाज के उस व्यथित हिस्से की तड़प , जो समाज में होते हुए भी अपने को तनहा और वीरान पता है और परमात्मा से सवाल करता है की  क्या मैं प्रेम के काबिल नहीं हूँ ?

बात करनी मुझे - जफरनामा

बात करनी  मुझे  मुश्किल  कभी  ऐसी  तो  न  थी, जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो ना थी | ले गया छिन्न के कौन आज तेरा सब्र~ओ~करार, बेकरारी तुझे या दिल कभी ऐसी तो ना थी | चस्म~ ऐ~ कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा  लेकिन जैसी अब हो गयी है कातिल कभी ऐसी तो न थी | उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू के तबियत मेरी मैल कभी ऐसी तो न थी | अक्स~ ऐ~ रुख~ ऐ~ यार ने किस से है तुझे चमकाया तब तुझ में माह~ऐ~कामिल कभी ऐसी तो न थी | क्या सबब तो जो बिगार्ता "जफ़र" से हर बार  खु तेरी हुर~ऐ~शामिल कभी ऐसी तो न थी | बहादुर शाह जफ़र 

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं, सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं। दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई, दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई। पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर? मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर। इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर? कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर! आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।