अप्रितम शुभ्र कुसुम सी लाली, अम्बर पर


अप्रितम शुभ्र कुसुम सी लाली, अम्बर पर |
हवन की वेदी सी पावन, निश्चल, सुंदर ||
है अग्नि सी तेज़ विराट, अभ्यंकर भी वो |
है नदी सी बहती निश्चल, निर्झर, चंचल जल ||
उषा की पहली किरण सी है वो चमकीली |
भोर की खिली, कलि सी वो नाजुक, कोमल ||
माध्य पहर सी जीवट और कठोर भी वो |
सांझ की मधुर हवा , बहती मन में कल कल ||

                     

                                                                  दिनेश आर्य "दिनू"

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