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बात करनी मुझे - जफरनामा

बात करनी  मुझे  मुश्किल  कभी  ऐसी  तो  न  थी, जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो ना थी | ले गया छिन्न के कौन आज तेरा सब्र~ओ~करार, बेकरारी तुझे या दिल कभी ऐसी तो ना थी | चस्म~ ऐ~ कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा  लेकिन जैसी अब हो गयी है कातिल कभी ऐसी तो न थी | उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू के तबियत मेरी मैल कभी ऐसी तो न थी | अक्स~ ऐ~ रुख~ ऐ~ यार ने किस से है तुझे चमकाया तब तुझ में माह~ऐ~कामिल कभी ऐसी तो न थी | क्या सबब तो जो बिगार्ता "जफ़र" से हर बार  खु तेरी हुर~ऐ~शामिल कभी ऐसी तो न थी | बहादुर शाह जफ़र 

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं, सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं। दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई, दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई। पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर? मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर। इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर? कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर! आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।